खोज
मानव का स्वभाव रहा है वह सब जानना चाहता है और उसकी इसी इच्छा से प्रारम्भ होता है खोज का, खोज , जी हाँ खोज ! आज जो भी ज्ञान या सन-साधन मानव समाज के पास उपलब्ध है उसके पीछे मानव की यही खोजने की जानने की जो लालसा है इच्छा है । इसी के दम पर पृथ्वी पर रहते हुए भी हमारे पूर्वजों ने अंतरिक्ष के तारो सितारों की गति, कक्षा, प्रभाव तक का आँकलन किया । जो आज भी किसी चमत्कार से कम नही है । इसके साथ हाई मानव ने अपने जीवन को आसान करने के लिए अनेकों प्रकार के साधन भी बना लिए है जिससे उसका नित्य दिनचर्या का कार्य आसानी से पूर्ण हो जाता है । इतना सभ कुछ होने के बाद भी मानुष के अंदर की अभिलाषा पूर्ण रूप से समाप्त नही हुई है उसके अंदर अभी भी इक अधूरापन है जिसे सभी सन-साधन मिल कर भी पूरा करने में असमर्थ है।